Tuesday, September 29, 2009

मेरी आकांक्षा


मेरी क्या आकांक्षा है,
तुम्हें कैसे बताऊँ,
कि मैं चाहती हूँ,
तुम्हारे कंधे पर सर टिकाकर,
सब कुछ भूल जाना,
तुम्हारे सीने पर सर रखकर,
तुम्हारी धडकनों को सुनना,
तुम्हारी आंखों में तैरती भावनाओं को,
स्वयं में जज्ब होने देना,
नीले आकाश के नीचे लेटकर,
उसमें स्वयं को भूल जाना,
सागर जैसी तुम्हारी बाहों में,
एक बूँद के समान समा जाना,
और भूल जाना,
कि मेरा अपना भी कोई अस्तित्व है,
बस! यही तो मेरी आकांक्षा है,
सुन रहे हो न??

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