Tuesday, September 29, 2009

यादों के साए


क्या भूलूं, क्या याद करूँ,
क्यों कल के साए में अपने आज को बर्बाद करूँ,
जो बीत गया वो सपना था,
जो पास है वही अपना है,
जब-जब मन यादों के सागर में गोते लगाता है,
जीवन तब-तब ख़ुद को वहीं खड़ा पाता है,
सच था या सपना,
वो वक़्त जब तुम मेरे साथ थे,
अब यह आलम है कि,
तुम तो क्या तुम्हारा साया भी यहाँ नहीं,
क्या हुए वो वादे जो किए थे तुमने कभी,
याद आते हैं वो सपने मुझे कभी-कभी,
पर अब न तो यहाँ तुम हो न तुम्हारा साया,
छोड़ कर इस स्याह अंधेरे में,
चले गए तुम न जाने कहाँ,
जाओ तुम्हें मुक्त किया,
जी लूंगी मैं तुम्हारे बिन,
क्योंकि खुशियाँ न सही,
जीवन में ग़मों कि कमी नहीं.....

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