Tuesday, September 29, 2009

क्यों सोचती हूँ मैं..


क्यों सोचती हूँ मैं,
कि काश तुम मेरे होते,
मेरे साथ चलते,
मुझे अपने दुःख-सुख में भागीदार बनते,
मेरे दुःख बाँटते
मुझे हंसाते,
जब मैं रोती तो मेरे आंसू पोछते,
और कहते कि तुम मेरे साथ हो, हमेशा।
क्यों सोचती हूँ मैं,
कि काश तुम मेरे होते,
साथ न सही, सामने ही होते,
तुम्हे देख कर ही मैं खुश हो लेती,
और समझ लेती कि तुम पर मेरा इतना हक तो है,
काश तुम मेरे होते,
सामने न सही,सपनों में तो होते,
तुम्हें सोच कर ही मैं खुश हो लेती,
और जी लेती उन क्षणों को,
जो न कभी आए न आयेंगे,
क्यों सोचती हूँ मैं,
कि काश तुम मेरे होते,
जबकि मैं जानती हूँ कि तुम मेरे नहीं,
किसी और के लिए बने हो,
क्यों सोचती हूँ मैं कि काश तुम मेरे होते,
जबकि मैं जानती हूँ कि तुम मेरे नहीं हो.....

3 comments:

  1. bahit accha likha hai

    wakai me agar tum aisa likhti rahogi to yakeenan wo jisko soch kar likha hai aapka ho jaega

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  2. kisiko soch kar nahi lika dear....ye sab to graduation me likha tha...blog par ab daala hai

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  3. achhi kavita ban sakti hai agar mehnat ki jaye aur faltu shabdo ko hata dia jaye

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