Tuesday, September 29, 2009

सागर का दुःख


सागर को देखा है कभी?
उसमें उठती-गिरती लहरों को,
जो उठती हैं तो इतने वेग से,
की उसमें सब कुछ बह जाता है,
शेष कुछ भी न रहता है,
बाकी रह जाता है एक निशान,
जो थोड़ी देर तक याद दिलाता है,
उस लहर की।
कभी देखा है बादलों को?
उनसे बरसती बूंदों को,
जो बरसती हैं तो साथ लाती हैं,
एक एहसास, शीतलता का,
इतनी शीतल कि हर कष्ट हर लें,
काश! तुम उस सागर के समीप गए होते,
जो निरंतर मेरे अन्दर कि भावनाओं में हिलोरें ले रहा है,
कभी उन लहरों को अपने पास आने देते,
जो तुम्हारे सभी दुःख बहा ले जाना चाहती हैं,
समा लेना चाहती हैं उन दुखों को अपने भीतर,
और छोड़ देना चाहती हैं तुम्हें इतना शीतल,
जितना तुम उन बूंदों से भीगने के बाद हो जाते,
जो स्नेह के रूप में मेरे ह्रदय से बरसना चाहती हैं...

1 comment:

  1. bahut sundar bhavnayeen vyakt ho rahi hain

    lekin kaso inko. aapkey pas shresth kavita ki sambhavna hai

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