
जब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ कुछ ऐसा,
जैसे कोई अंकुर फूटा हो धरती के तन में,
जब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ कुछ ऐसा,
जैसे कोई कविता उपजी हो मेरे मन में,
जब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ कुछ ऐसा,
जैसे कोई मुक्त पंछी उड़ा हो नील गगन में,
जब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ कुछ ऐसा,
जैसे कोई पथिक चला हो अकेला गहन वन में,
जब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ कुछ ऐसा,
जैसे बहारें आई हो मेरे सूने जीवन में,
तुम्हारे आने से...
yes this is a poem and now this is my last comment on your poems i will try to show you what is surplus in this poem
ReplyDeleteजब भी सोचती हूँ तो पाती हूँ
जैसे कोई अंकुर फूटा हो धरती के तन में,
जैसे कोई कविता उपजी हो मेरे मन में,
जैसे कोई मुक्त पंछी उड़ा हो नील गगन में,
जैसे कोई पथिक गहन वन में,
जैसे बहारें मेरे जीवन में,
तुम्हारे आने से jaisee ...
it can further be refined. now you try yourself and remove surplus. thank you very much. I really enjoyed poetry