Tuesday, September 29, 2009

ज़िन्दगी


रफ्ता-रफ्ता सामने आती गई ज़िन्दगी,

धीरे-धीरे मुझे समझाती गई ज़िन्दगी,

परत दर परत खुलती चली गई,

मुझको ख़ुद में उलझाती गई ज़िन्दगी,

बंद मुट्ठी में रेत जैसे,

हाथों से यूँ निकलती गई ज़िन्दगी,

घड़ी की दो सुइयां कभी ठहरती नहीं,

यह बात बतलाती गई ज़िन्दगी,

मैंने तो कभी गौर न किया पर,

सच और झूठ सामने लाती गई ज़िन्दगी,

कौन कहता है ज़िन्दगी जीने के लिए बनी है,

मुझे पल पल रुलाती गई जिन्दगी.

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