
मैंने देखा था एक सपना,
कि मैं बैठी हूँ तुम्हारे पास,
कह रही हूँ वो सब ,
जो मैं कहना चाहती हूँ,
मैंने देखा था एक सपना,
कि मैं बैठी हूँ तुम्हारे पास,
रो रही हूँ उस दुःख से,
जो शायद तुमने ही मुझे दिया है,
मैंने देखा था एक सपना,
कि मैं बैठी हूँ तुम्हारे पास,
सोच रही हूँ उस भविष्य को,
जो बहुत सुखद होगा,
जिसमें तुम और मैं,
यूँ ही बैठे होंगे, पास-पास,
पर मुझे याद न था,
कि यह सिर्फ़ एक सपना है,
जो कभी पूरा न होगा,
क्योंकि सपने तो सपने ही होते हैं,
जो पलकों पर तब तक ही सजे रहते हैं,
जब तक वे खुल नही जातीं...
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