Wednesday, September 30, 2009

दो बूँद




यह कविता मेरी कल्पना नहीं है...कहीं सुनी थी और अच्छी लगी
तो सबके साथ बाँटना चाहती हूँ


दो बूँद सावन की,
एक गिरे सागर में और मोती बन जाए,
दूजी मिले झील में और अपना आप गँवाए,
किसकी किस्मत समझे कोई,
किसको दोष लगाये,
दो बूँद सावन की...

7 comments:

  1. संवेदना सराबोर करने वाली...अच्छे शब्द...सुंदर पेशकश...शुभकामनाएं.

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  2. दो बूँद सावन की,
    एक गिरे सागर में और मोती बन जाए,
    दूजी मिले झील में और अपना आप गँवाए,
    किसकी किस्मत समझे कोई,
    किसको दोष लगाये,
    बहुत गहरे भाव है बनाए रखे
    ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं, लेखन कार्य के लिए बधाई
    यहाँ भी आयें आपके कदमो की आहट इंतजार हैं,
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  3. यही जीवन है । सुन्दर ।
    कृप्या वर्ड वेरीफिकेशन हटा दे, टिप्पणी करने में सुविधा होती है ।



    गुलमोहर का फूल

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  4. बहुत सुंदर है ...लिखते रहें

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  5. सुंदर शब्द सुंदर भाव.

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