काँटों की सेज पर बैठी मैं
रेशम की डोर सी मेरी जिंदगी
मेरे पास से यूँ सरकती चली गई
न कोई आह न सिसकी
कुछ यूँ मेरी मुस्कराहट
आंसुओं से दरकती चली गई
कोई आया न घूंघट उठाने
और मैं आँचल का हर मोती
तेरे नाम पे रखती चली गई
हाथ उठाये तुम्हें छूने को
तुम नज़र फेर के चल दिए
और मेरी नज़रें
तेरे हर कदम के निशान पर झुकती चली गई
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