Wednesday, December 9, 2009

कांटे

काँटों की सेज पर बैठी मैं

रेशम की डोर सी मेरी जिंदगी

मेरे पास से यूँ सरकती चली गई

न कोई आह न सिसकी

कुछ यूँ मेरी मुस्कराहट

आंसुओं से दरकती चली गई

कोई आया न घूंघट उठाने

और मैं आँचल का हर मोती

तेरे नाम पे रखती चली गई

हाथ उठाये तुम्हें छूने को

तुम नज़र फेर के चल दिए

और मेरी नज़रें

तेरे हर कदम के निशान पर झुकती चली गई

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