कभी सोचा था
जीवन की इस राह पर
जो कहीं ऊँची कहीं नीची
कहीं टेढ़ी कहीं मेढ़ी है
साथ चलोगे तुम
मेरा हाथ थामकर
मगर क्या पता था
की ज़िन्दगी में
जो मैं चाहूँ वही नहीं होगा
क्योंकि रिश्ते
किसी एक के बनाये नहीं बनते
क्या पता था
कि एक दिन
तुम चल दोगे मुझे छोड़कर
और मैं बैठी रह जाऊँगी
तुम्हारे इंतज़ार में
क्या पता था
कि बहारें आएँगी
और फिर लौट जायेंगी
मेरे जीवन को फिर से
सूना करने के लिए
और मैं बैठी रह जाऊँगी
तुम्हारे इंतज़ार में..
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