Wednesday, December 9, 2009

रंग..

खिड़की से झांकता चाँद
और कटी फटी सी चांदनी
जो सीखचों की आड़ से बचकर
किसी तरह मेरे पास आकर बैठ गई
ओस ने छींटे दिए
और मिलकर मुझे सहलाया
दुलारा मुझे
और सजा दिया मेरे बेचारे सपनों को
एक नई उम्मीद देकर
की कोई तो आएगा
मेरी अंजुरी में रंग भरने.....

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