Saturday, January 9, 2010

तुम बिन..

तुम बिन मेरी क्या कीमत है
एक दिन आँकने बैठी तो पाया
कि पलकों से ख्वाब ओझल हो गए
सपनो से रंग धूमिल हो गए
हाथों को हाथ नहीं सूझता
कोई मुझे जान कर भी नहीं बूझता
धूप अब सर्द सी लगने लगी है
बारिश भी कुछ रुखी हो चली है
हवाओं में वो गुनगुनाहट नहीं रही
चांदनी न जाने क्यों अब न गा है
आँखों में अब आँसू भी नहीं आते
शायद अब हम उन्हें भी नहीं भाते
न जाने कैसे ये सिलसिले चले हैं
अब जाके जाना कि हम कितने अकेले हैं
तुम बिन

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