Wednesday, January 20, 2010

कच्चे सपने

पड़ोस के कुम्हार के
चाक पर रखी मिट्टी
और उससे बने बर्तनों से
कच्चे मेरे सपने
जो चले थे
दुनिया से लड़ने
सारी मुसीबतों को झेलकर
आग में तपकर
पक्का होने
ताकि वो तुम्हें शीतल कर सकें
ठेस लगी एक
और पल में टूट गए

Monday, January 11, 2010

जब ऐसा हो..

साँसों कि ताल पर

जब गीत डगमगाने लगें

पलकों की कोर पर

जब सपने भीगे आने लगें

शब्दों की भीड़ में

जब सुर खोखले आने लगें

जीवन की सेज पर

जब हाथ कांटे सजाने लगें

तो समझना

मेरे दिल का एक कोना

तुम्हारे लिए मर गया

Saturday, January 9, 2010

तुम बिन..

तुम बिन मेरी क्या कीमत है
एक दिन आँकने बैठी तो पाया
कि पलकों से ख्वाब ओझल हो गए
सपनो से रंग धूमिल हो गए
हाथों को हाथ नहीं सूझता
कोई मुझे जान कर भी नहीं बूझता
धूप अब सर्द सी लगने लगी है
बारिश भी कुछ रुखी हो चली है
हवाओं में वो गुनगुनाहट नहीं रही
चांदनी न जाने क्यों अब न गा है
आँखों में अब आँसू भी नहीं आते
शायद अब हम उन्हें भी नहीं भाते
न जाने कैसे ये सिलसिले चले हैं
अब जाके जाना कि हम कितने अकेले हैं
तुम बिन

सपने..

हर किसी की आँखों में क़ैद
कुछ सपने होते हैं
जो हर किसी के पूरे नहीं होते हैं
जो पूरे हो जायें
वो हकीकत कहलाते हैं
और जो पूरे नहीं होते
उन्हें पलकों में लिए
हम सारी उम्र सोते हैं

तुम

मेरे जीवन के साज़ की आवाज़ हो तुम
मेरा आने वाला कल
और मेरा अपना आज हो तुम
जो मैं जानना भी न चाहूँ
ऐसा एक खोया हुआ राज़ हो तुम
मुट्ठी में बंद मेरी खुशियाँ
और आँखों में क़ैद
मेरे सपनो की परवाज़ हो तुम
जिसकी वजह से मुझे खुद पर भरोसा है
मेरे जीवन के हर पल में बसा
एक सुनहरा कल
और खूबसूरत आज हो तुम
मेरे जीवन के साज़ की आवाज़ हो तुम