वो काली यादें
परछाई जैसी
मेरे क़दमों से चिपटी हुई हैं
दिन भर मेरे साथ साथ
चलती हैं
चाहे जहाँ भी जाऊं
मेरे हर कदम के साथ
उठती हैं गिरती हैं
और साथ ही
उठता गिरता है
आँसुओं का तूफ़ान
मेरे भीतर
और रात के अँधेरे में
वो चालाक परछाईयाँ
काले अँधेरे के साथ
घुल मिल कर
ढांप लेती हैं मुझे
ताकि चूस सकें
मेरा बचा खुचा
अल्हड़पन और बचपन
और रात के अँधेरे में
ReplyDeleteवो चालाक परछाईयाँ
काले अँधेरे के साथ
घुल मिल कर
ढांप लेती हैं मुझे
ताकि चूस सकें
मेरी बचा खुचा
अल्हड़पन और बचपन
इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....
सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।
ReplyDeletebahut hi sundar bhaav liye hue hai aapki rachna..
ReplyDeletevery nice.....
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बहुत हे सुन्दर लिखा है..सरल, भावपूर्ण ...बहुत अच्छा
ReplyDeleteatyant bhawpurn rachna.
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