Thursday, March 25, 2010

मेरे मन

मेरे मन
न आ तू करीब मेरे
रहने दे यूँ ही अकेला
कुछ देर
जूझने दे मुझे खुद से
इस सन्नाटे के जाल में फंसकर
तड़पने दे मुझे
ये अँधेरा ये अकेलापन
ये ख़ामोशियों का भँवर
लीलने दे इसे मुझे
और समा जाने दे मुझे इसमें
नहीं बिखरुंगी भरोसा रख
इस खोखलेपन में समाकर
खुद को होम कर
इस तपन में जलकर ही
जन्म होगा एक नयी "मैं" का
जिसके होठों पर
झूठी मुस्कराहट नहीं होगी
मुखोटा नहीं होगा
होगा तो सिर्फ स्नेह
भरोसा और आत्मसमर्पण
और मेरे मन
तब तेरे घाव भी भर चुके होंगे

1 comment: