Monday, May 10, 2010

वो शिकार लड़की

वो काली यादें
परछाई जैसी
मेरे क़दमों से चिपटी हुई हैं
दिन भर मेरे साथ साथ
चलती हैं
चाहे जहाँ भी जाऊं
मेरे हर कदम के साथ
उठती हैं गिरती हैं
और साथ ही
उठता गिरता है
आँसुओं का तूफ़ान
मेरे भीतर
और रात के अँधेरे में
वो चालाक परछाईयाँ
काले अँधेरे के साथ
घुल मिल कर
ढांप लेती हैं मुझे
ताकि चूस सकें
मेरा बचा खुचा
अल्हड़पन और बचपन

क्या माँगा..

मैंने आखिर क्या माँगा
एक टुकड़ा चाँद का
मुट्ठी भर आसमान
सूरज की कुछ किरणें
चंद बूँदें बारिश की
एक प्याला गर्म चाय
चंद लम्हे फुर्सत के
थोड़ी सी मासूम हँसी
खुशियों के कुछ आँसू
माँ के आँचल का एक छोर
थोड़ी खुशियाँ हर ओर
कुछ बचपन की शरारतें
और माँगा थोडा सा
निश्छल स्नेह
बस यही तो...