Thursday, February 11, 2010

धरती

मन की गीली रेत पर

ये जो कदमों के निशान छोड़े हैं तुमने

जाते जाते उन्हें तो साथ लेते जाओ

मेरी यादों की हर लहर

उन्हें और पक्का ही करेगी

कभी मिटा न सकेगी

और उस निशान में मेरा समर्पण

झाग कि तरह बैठ जाएगा

हमेशा हमेशा के लिए

और रह जाउंगी मैं

अपने साथ लिए

एक खारापन और सपनों की तलछट

पर मेरा मन

किसी के अधूरे स्नेह का प्यासा नहीं

जियूंगी मैं

इस खारेपन को समेटकर

और अपने भीतर पलती

हर कल्पना को इतनी शक्ति दूंगी

कि वो चाँद को भी छू सकें

देखना एक दिन

लकीरें

मेरे हाथों में
ये चन्द जो लकीरें हैं
मानो न मानो
पर ये
मेरी तुम्हारी
मिली जुली तकदीरें हैं
वो आधा हिस्सा
जो पूरा करे ये किस्सा
तुमने चुरा लिया था
आधा छूटा मेरे पास
ढूँढ रही हूँ अब तक
कहाँ हो
चले आओ, चले आओ....